कुमाऊ में अल्मोड़ा नन्दादेवी, बागेश्वर कोट भ्रामरी एवं नैनीताल में नयना देवी में आयोजित नन्दादेवी मेले का इतिहास
-शंकर दत्त पाण्डेय
उत्तराखण्ड को धार्मिक व सांस्कृतिक रूप से समृद्व राज्य के रूप में माना जाता है। यहॉ पर अनेक विश्व प्रसिद्व धार्मिक स्थल व पर्यटन क्षेत्र है। राज्य में अनेक मेलों एवं महोत्सवों का आयोजन प्राचीन काल से होता आ रहा है। इसी कड़ी में कुमाऊ मण्डल में भाद्र पक्ष की अष्टमी को नन्दाष्टमी के रूप में मेले का आयोजन किया जाता है। कुमाऊ मण्डल की सीमा के निकट नन्दगिरी पर्वत पर नन्दा नाम से विख्यात हुई। नन्दा शब्द स्वयं में आनन्द व सुख का द्योतक है। मॉ नन्दा की कृपा से सभी को सुख और आनन्द की प्राप्ति हुई इसलिए भक्तजनों ने इन्हें कुलदेवी के रूप में स्थापित किया। मॉ की प्रेरणा से चन्द्रवंशीय शासकों ने इनकी स्थापना अल्मोड़ा में की। गढ़वाल विजय के बाद चन्दवंशीय राजा नन्दा की प्रतिमा (डोला) सहित गरूड़ पहुॅचे। राजगुरू ने देवी की विधिवत पूजा करायी और रात्रि विश्राम गरूड़ में किया। अगले प्रातः राजगुरू ने देखा कि एक प्रतिमा दो भागों में बटी है। द्विखण्डित प्रतिमा की एक खण्ड की स्थापना कोट (गरूड़) में करायी वह कोटमायी कहलायी। दूसरे खण्ड की स्थापना अल्मोड़ा में की गयी। आज भी इसकी मुख्य पूजा का अधिकार चन्दवंशीय को ही है। चन्दवंशीय राजा आनन्द सिंह की मृत्य ु के बाद पूजा का दायत्वि चन्दवंश की काशीपुर शाखा को दिया गया। आज भी अल्मोड़ा में आयोजित होने वाली पूजा का सम्पादन चन्दवंशीय के वंशजों द्वारा किया जाता है। पूर्ण शास्त्रीय आधार न हो पाने के कारण कई प्रकार के मिथक व किवदंतिया भी हमारी परम्परों से जुड़ जाती है। एक स्थानीय मान्यता यह भी है कि चन्द राजा की नन्द नाम की बहन अपने मायके आ रही थी। उसके लाल वस्त्रों को देख कर एक भैंसा (जतिया) उसे मारने के लिए दौड़ पड़ा त बवह केले के पत्तों की झाड़ियों में छिप गयी। तभी एक बकरी ने आकर केले व झाड़ी के पत्ते खा दिये तभी भैंसे ने फिर से नन्दा को देख लिया और क्रोधित हो उसने नन्दा को मार डाला। बाद में नन्दा के भाई ने उनकी स्मृति में नन्दादेवी के रूप में स्थापना कर दी। और प्रतिशोध के रूप में बकरे व भैंसे की बलि दी जाने लगी जो कई स्थानों पर आज भी दिखायी देती है। भावुक भक्तजन परम्परा के अनुसार आज भी केले के वृक्ष से डोला बनाकर दो रूपों में नन्दा की पूजा सम्पादित करते हैं मॉ नन्दा की मूर्ति द्विखण्डित हो गयी थी इसलिए नन्दा व सुनन्दा के रूप में इसकी झॉकी तैयार की जाती है। अष्टमी की तिथि दुर्गा जी को अतिप्रिय है। इसी तिथि को उनका प्राकट्य हुआ इसलिए इस तिथि को दुर्गाष्टमी भी कहा जाता है। दुर्गा मॉ-नन्दा का उदभव नन्दगिरी पर्वत से होने के कारण झॉकी को पर्वतीय आकार दिया जाता है। श्वेत पगड़ी बर्फ की द्योतक पीली व चौडी मुखाकृति सूर्य सदृश्य आभा की द्योतक है। वैश्वीकरण के दौर में अब मेलों ने व्यापारिक रूप ले लिया है जिसके चलते ये धार्मिक मेले कई स्थानों पर संचालित होने लगे। पहले अल्मोड़ा में ही विशेष रूप से इस मेले का आयोजन किया जाता था। स्थानीय लोग इसमें सम्मलित होते थे और झौड़े, चांचरी सहित अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होता था। इस मेले में जागर लगाने वाले कौसानी के समीप ल्वेशाल से लोग आते है। वर्तमान में नैनीताल, गरूड़, बागेश्वर, कपकोट, सनेती आदि क्षेत्रों में नन्दा मेले का आयोजन होता है। विधिवत् डोला विसर्जन का कार्यक्रम बड़े भव्यरूप से किया जाता है। पूरे शहर मंे इसे धार्मिक अनुष्ठान व भजन कीर्तन के साथ घुमाकर बाद में विधिवत रूप से इन प्रतिमाओं का विसर्जन डोबा नौला में किया जाता है। डोले का विसर्जन रवि, बुद्व व शुक्रवार को किया जाता है। अष्टमी को प्रगटी देवी को कुमाऊ नरेश ने कुलदेवी के रूप मंे गौरा नाम से और रण की देवी के रूप में पूजना आरम्भ किया।
भारत एक विशाल देश है यहॉ की संस्कृति एवं मान्यतायें भी विविधता से भरी है। पर्व, उत्सव व मेले ही समाज को एकसूत्र में बाधने का काम करते है। वर्तमान में पलायन के कारण गॉवों में कम, कस्बों में अधिक मनाये जा रहे है। पर्वताकार डोली में कदली आदि वनस्पतियों द्वारा निर्मित देवी शक्ति का अनुष्ठान हमारे पर्यावरण व प्रकृति प्रेम को प्रकट करता है साथ ही नारी शक्ति के प्रति हमारी सम्मान, निष्ठा व सेवा भाव को पुष्ट करता है। भाद्र शुक्त अष्टमी की यह पावन तिथि दुर्गाष्टमी, राधाष्टमी, नन्दाष्टमी आदि नामों से वैष्णवी शक्ति को द्योदित करती है। अतः हमें शब्दों का गूढ़ रहस्य समझते हुए सात्विक पूजा करते हुए पर्यावरण संरक्षण सहित जीव रक्षा करते हुए एक श्रेष्ठ समाज का संकल्प लेना चाहिए यही इस उत्सव का संदेश है।