Shakti Samachar Online

हमारे लोक देवता


‘अल्मोड़ा टाइम्स ‘ में पूर्व में प्रकाशित इतिहासकार पण्डित नित्यानन्द मिश्र जी की डायरी का यह अंश साभार सहित।
—-कूर्माचल का कल्याणकारी कत्यूरी राजा हरिश्चंद्र देव उर्फ़ हरु —-
न इतिहास के पृष्ठों में, न ताम्रपत्रों में, न शिलालेखों में, न किसी प्रमाणिक दस्तावेजों में इस धर्मनिष्ठ, सत्यवादी, परोपकारी राजा का वर्णन मिलता है पर सैकड़ों वर्ष बीत जाने पर भी कुमाऊँनी लोकमानस में, कुमाऊँनी लोक- हृदय पटल में उसका नाम, उसकी कीर्ति, उसका क्रियाकलाप उत्कीर्ण है। आज भी उसका नाम स्मरण करते ही लोक गायक के कण्ठ से यह वाणी नि:सृत होती है:- ” औना हरु हर पट्ट , जौना हरु खड़ पट्ट ” जब हरु आता है धन – वैभव भी उसके साथ आता है। धरती हरी – भरी हो जाती है।चारों ओर हरियाली ही हरियाली दृष्टिगोचर होती है।जब हरु चला जाता है चारों ओर उजाड़ हो जाता है। दु:ख , दारिद्र्य , विपत्ति – विपन्नता सर्वत्र छा जाती है।
लोक कण्ठ की गंगोत्री से प्रस्फुटित होती यह स्रोतस्विनी इस रूप में है –
बहुत दिन हुए कूर्माचल के पूर्वी अंचल में ‘ हुई ‘ चम्पावत के पास एक राजा राज्य करता था।उसका नाम हरिश्चंद्र था। वह बड़ा शास्त्रज्ञ और ज्ञानी था। परोपकारी , सत्यवादी और शरणागत वत्सल था। बूढ़ा होने पर उसने अपना राज – काज अपने पुत्र को सौंप दिया। स्वयं वानप्रस्थ लेकर हरिद्वार के निकट तपोवन में तपस्या करने लगा।
कहते हैं कि उसने हर की पैड़ी तैयार करवाई ।कुछ समय पश्चात उसने एक सिद्ध पुरुष का शिष्यत्व ॻहण किया और उनसे मंत्र ॻहण कर सन्यास ले लिया। कठिन योग साधना, तपश्चर्या राजा के लिए फलवती हुई। उसे वाकसिद्धि मिल गई। उसके कण्ठ से जो भी वाणी नि:सृत होती वही सच हो जाती।उनके आशीर्वाद से अन्धों को आँखें मिली , रोगी रोगमुक्त हुए ।इस प्रकार परोपकार के कार्य करते हुए हरु ने चारों धामों की पदयात्रा की।
बहुत बृद्ध होने पर अपनी मात्र भूमि ‘ सुई ‘ चम्पावत में आ गये। इनकी अद्भुत सिद्धियों से प्रभावित सैकड़ों की संख्या में लोग इनके शिष्य हो गए। इनके धर्मनिष्ठ आचरण शुद्ध – पवित्र जीवन एवं परोपकारवृत्ति के कारण लोग इनके जीवन काल में ही उनको पूजने लगे। परिवार के सदस्य भी उनके शिष्य हो गए। उनका अनुज लाटू उनका अनन्य भक्त था। उनके अन्य भक्तों में प्रमुख थे:- स्यूरा – प्यूरा , रुदा ( कठायत ) , भोलिया , भेलिया , मंगलिया और उदलिया । हरु ने एक संघ की स्थापना की। उसके सदस्य ‘ बर ‘ या ‘ बरु ‘ कहलाते थे। ‘ सैम ‘ भी एक ‘ बरु ‘ था।
‘ हरु ‘ ने अपने दीर्घ जीवनकाल में लोगों को सदाचरण का महत्व बताया। लोगों को लीक में रखा। दीन- दु:खियों की सेवा की। धन , वैभव , सुमति से सम्पन्न किया। एक दिन योग क्रिया द्वारा हरु ने समाधि ले ली। उनका अनुज लाटू अपने अॻज का अनन्य भक्त था। कालांतर में हरु और लाटू की देवता के रूप में साथ – साथ पूजा होने लगी।
लोकगायक कहता है कि हरु शान्त स्वभाव का देवता है। उसकी पूजा से नित्य ही मंगल होता है इसलिए लोककण्ठ से प्रसूत इस उक्ति पर ” औना हरु हर पट्ट , जौना हरु खड़ पट्ट ” ।जन साधारण का अटूट विश्वास है । हरु के आने से सम्पत्ति आती है और जाने से विपत्ति।
भले ही इतिहास ने इस कल्याणकारी कत्यूरी राजा हरिश्चंद्र देव को विस्मृत कर दिया हो पर कूर्मांचलीय जन – मानस के हृदय – पटल पर उनका नाम आज भी स्वर्णाक्षरों में अंकित है। अज्ञात लोकगायक ने उनके गीत रचकर उन्हें अमर बना दिया। पीढ़ी दर पीढ़ी सैकड़ों वर्षों से लोकगायक उनके गीत गा रहे हैं। जन साधारण उनके पुण्य – स्मृति को अपने अन्त: स्थल में संजोए हैं।उन्हें देवता मानकर पूजते हैं
हरु का एक मन्दिर कत्यूर के थान ॻाम में है। लाटू के मन्दिर बरवै ( वल्दिया और भोलिया ) ‘ भटकोट ‘ में है।

अतिशय प्रीति के कारण ही ‘ त’ कार शब्द का प्रयोग किया जाता है। लेख के लेखक ने इसी भाव को व्यक्त किया है।

प्रकाश पंत
वरिष्ठ पत्रकार

error: Content is protected !!