पुस्तक-झंझाबात,बच्चों के लिए सबसे बड़ा दुख मां का ना होना ही होता है …..
समीक्षा
पुस्तक—झंझाबात
लेखकमंडल–
हरीश जोशी
अचला जोशी
अनुराग जोशी
जोशी परिवार की विरह के प्रस्फुटन से उद्भूत भावनाएं झंझाबात के रूप में पढ़ने को प्राप्त हुई। वस्तुत:यह रचना पत्नी के असमय ही परलोक गमन के कारण पति के जीवन के अधूरेपन की और बालमन के मातृविहीन हो जाने की एक मर्मस्पर्शी गाथा है। मंजू जोशी की जीवन यात्रा एक संस्कारी परिवार मैं जन्म से आरंभ होती हुई शिक्षा के साथ साथ सांस्कृतिक मूल्यों से भी अभिसिंचित होती है।
भारतीय मान्यताओं के अनुरूप एक निश्चित कालखंड में गृहस्थ धर्म में प्रवेश करती हुई मंजू जोशी अपने शिक्षा की गति को निर्बाध रूप से आगे बढ़ाती हुई शिक्षा, संस्कृति, धर्म और परंपराओं व अध्यात्म को अपने जीवन का अभिनंदन अंग बनाकर संघर्षरत रहती हैं।
झंझावात के माध्यम से लेखक मंडल ने अपने विचारों के तूफान को बारह किस्तों में निबद्ध कर भारतीय सांस्कृतिक विरासत के प्रति अपनी व मंजू जोशी की भावनाऐं स्पष्ट कर दी है।भारतीय मान्यता के अनुसार बारह मास का कालखंड वार्षिकी के रूप में जाना जाता है जिसमें दिवंगत आत्माओं की तृप्ति व शांति हेतु तर्पण किया जाता है। इस ग्रंथ के माध्यम से शब्द ब्रह्म का प्रवाह करते हुए लेखक मंडल ने शिक्षा प्रेमी मंजू जी के प्रति वास्तविक प्रेमांजलि प्रदान की है। निश्चय ही यह पुनीत भावांजलि उनको तृप्त करेगी।
भावी प्रबल की भावनाओं से प्रथम किश्त प्रारंभ करते हुए लेखक ने बड़े शब्द गांभीर्य के साथ सब दिन होत न एक समाना की गहन व्याख्या की है। मंजू के व्यक्तित्व को जानने के लिए लेखक ने 27 वर्ष पूर्व की बात का जिक्र करते हुए अपनी गहन संवेदना और यादों को बड़ी स्पष्टता के साथ प्रथम किस्त में अभिव्यक्ति दी है। वैवाहिक संदर्भ में मंजू के द्वारा फोन पर बात की जाने की भावनाओं को भी लेखक ने उनके संस्कारों से जोड़ने का प्रयास किया है जो कि मंजू के व्यक्तित्व की और भी परिपक्वता व संस्कारशीलता को स्पष्ट कर देता है। मंजू के द्वारा दी गई चांदी की कलम (लेखनी) आज भी लेखक को मंजू के शिक्षा प्रेमी होने का एहसास कराती है। जीवन के प्रथम आश्रम में शिक्षा और द्वितीय आश्रम में गृहस्थ की यात्रा को पूर्ण करके मंजू जी महायात्रा के मार्ग पर निकल पड़ी इस समय को भी लेखक ने लिपिबद्ध किया है।
25 वर्ष के इसी कालखंड में विभिन्न प्रकार की शिक्षा ग्रहण करना, तकनीकी ज्ञान प्राप्त करना,सामाजिक सरोकारों से जुड़ना व विभिन्न शिक्षण संस्थानों में शिक्षा दान कर कीर्तिमान हासिल करने की यात्रा को भी बड़ी मुखरता से लिखा गया है।
बच्चों की पढ़ाई के साथ-साथ गृहस्थ की सारी गतिविधियां चलती रही ।अचानक मंजू जी का बीमार होना और दूरभाष से उनके स्वास्थ्य शैथिल्य की सूचना लेखक को संशय में डाल देती है और मंजू की मृत्यु को तो लेखक ने अपनी हंसती खेलती दुनिया का उजड़ना माना है।
विभिन्न प्रकार की उपासनाओं व मंत्र पाठों के बाद भी मंजू का चले जाना लेखक को अपनी ही चूक लगती है, यह भाव उनकी धर्मशास्त्र के प्रति अटूट श्रद्धा को प्रगट करता है।
बच्चों के लिए सबसे बड़ा दुख मां का ना होना ही होता है ममत्व से वंचित होने की पीड़ा अचला ने बड़े मार्मिक शब्दों में व्यक्त की है। दसरी किस्त में अचला ने अपनी मां को आदर्श मां के साथ-साथ आदर्श शिक्षिका और अपने पथप्रदर्शिका के रूप में स्वीकार किया है ।वास्तव में मां के संस्कार ही बच्चों को उन्नत शिखर तक पहुंचाते हैं इसीलिए अचला ने अपनी उन्नति का श्रेय अपनी मां को ही दिया है। मिस मैरी की कहानी का जिक्र करते हुए अपनी मां का वृद्धावस्था से पहले चले जाने पर अचला बहुत दुखीहै ,इसके बाद भी लेखनी को धैर्य की डोरी से बांधकर अचला ने अपने मां के पदचिह्नों पर चलते हुए सुंदर जीवन प्रदान करने हेतु मां के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की है।
आंसुओं से तुम्हारे न होने का गम मिटा रहा हूं
जीना पड़ रहा है जी जो क्या रहा हूं–कहते हुए अनुराग ने मां के बिना संसार को सूना बताया है। मां के प्रति अपने सबल भावनाओं को व्यक्त करते हुए अपने मां के शिक्षण कौशल और उनके धैर्य आदि का अनुराग ने बड़ा ही गंभीर चित्रण किया है और अपनी मां को एक आदर्श शिक्षिका के रूप में भी स्वीकार किया है।
कालचक्र कभी थमता नहीं है इस प्रकार लेखक मंडल ने मंजू जी के देहावसान के बाद एक माह से बारह मास अर्थात् वार्षिकी के कालखंड को यादों का बारामासा के रूप में बड़े ही गंभीर ढंग से चित्रित किया है।इसमें उनके जीवन के विविध घटनाओं धार्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक ,व शैक्षणिक सरोकारों व नवाचारों को भी स्पष्टरूपेण लिपिबद्ध किया गया है।
यादों के बारहमासा में आगे बढ़ते हुए लेखक इतना भावुक हो जाता है कि वह गीता और अन्य ग्रंथों का घालमेल करते हुए” न दैन्यं न पलायनम् “कहते हुए अपने को स्थिर करने का प्रयास कर रहा है।
बारहमासा के क्रम में नवे मास का वर्णन करते हुए लेखक ने नौ के अंक की बड़ी विशद व्याख्या की है । नवरात्र में नवशक्ति का चिंतन कराने वाली अपनी शक्तिस्वरूपा पत्नी को अपने मध्य अनुपस्थिति पाकर लेखक बहुत ही भावुक है। नौ तारीख को नौ बजे लेखक का घर से जाना,नवे महीने सितंबर में ही पत्नी का शरीर त्याग व घर से निकलने के नवें दिन ही पत्नी के अलविदा का समाचार का वर्णन लेखक ने बड़ी ही बौद्धिकता के साथ किया है।
लेखक ने अपनी भावनाओं के बारहमासा के अंत में पितृ गायत्री सहित अपनी पत्नी को श्रद्धांजलि समर्पित की है।
लेखक मंडल के साथ ही समाज से जुड़े हुए विभिन्न बुद्धिजीवियों ने भी मंजू जी को लेखनी के माध्यम से श्रद्धांजलि समर्पित की है।
जाने चले जाते हैं कहां दुनिया से जाने वाले शीर्षक के माध्यम से केशव भट्ट जी ने मंजू जी को श्रद्धांजलि देते हुए उनके पति हरदा से परिवार एवं पत्रकारिता दोनों को थामे रखने की उम्मीद की है।
अल्प समय में आपने , कैसी छोड़ी छाप ।
इतनी जल्दी छोड़कर ,
कैसे चल दी आप ।।
दोहा के माध्यम से साहित्यकार मनोज कुमार खोलिया ने मंजू जी को श्रद्धांजलि अर्पित की है।
आशा जोशी ने मन की वेदना कविता के माध्यम से अपनी संवेदनाएं व्यक्त की हैं।
इस प्रकार तमाम पारिवारिक मित्रों , स्नेहीजनों शिक्षाविदों एवं सामाजिक सरोकारों से जुड़े हुए सज्जनों ने मंजू जी को अपने शब्दों के माध्यम से भावांजलि और श्रद्धांजलि अर्पित की है।
लेखक मंडल ने अंत में अनंत से अंत में शीर्षक के माध्यम से अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हुए
“निरन्तरं संसरति अतएव संसार:”
परिभाषा को स्वीकार करते हुए अपने कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ने का संकल्प लिया है जो कि अंतिम एवं शाश्वत विकल्प भी है।वास्तव में झंझावात एक सामान्य घटनाक्रम नहीं बल्कि लेखक मंडल के जीवन की भावनाओं की प्रबलता है ।इतने आपदकाल में भी लेखक मंडल ने बौद्धिकता का परिचय देते हुए स्वर्गीय मंजू जोशी को अपने भावपुष्प शब्द ब्रह्म के प्रवाह द्वारा समर्पित की हैं । लेखक मंडल का यह प्रयास सराहनीय एवं अनुकरणीय है । लेखन में साहित्यिक , विवरणात्मक या व्याकरणिक त्रुटियां हो जाना सामान्य बात है लेकिन लेखक मंडल की भावनाएं पूर्ण शुद्ध हैं और उन्होंने बड़ी निष्ठा के साथ शब्द ब्रह्म के द्वारा मंजू जी की आत्मा को भावांजलि प्रदान की है।निश्चय ही ये भावपुष्प शिक्षा प्रेमी मंजू जोशी जी की आत्मा को शांति प्रदान करेंगे।
डॉ गोपाल कृष्ण जोशी
ग्राम -हनेटी(शान्तेश्वर)
प्रवक्ता हिंदी
इंटर कालेज क्वैराली
जनपद -बागेश्वर
उत्तराखंड
7409552315