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बागेश्वर जनपद का प्रसिद्ध सनगाड़ नवमी मेला

शंकर दत्त पाण्डेय

उत्तराखण्ड की देवभूमि अपनी समृद्ध धार्मिक परंपराओं, लोक संस्कृति और ऐतिहासिक मेलों के लिए देशभर में विशिष्ट पहचान रखती है। कुमाऊँ अंचल में लगने वाले पारंपरिक मेले केवल मनोरंजन के अवसर नहीं होते, बल्कि वे क्षेत्र की आस्था, लोकजीवन, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक विरासत के जीवंत प्रतीक हैं। इन्हीं प्रमुख पारंपरिक आयोजनों में बागेश्वर जनपद के सनगाड़ गांव स्थित श्री 1008 नौलिंग देव मंदिर का नवमी मेला विशेष महत्व रखता है। नवरात्र के अवसर पर आयोजित होने वाला यह मेला क्षेत्र की धार्मिक आस्था और कुमाऊँनी लोक संस्कृति का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है।

सनगाड़ स्थित नौलिंग देव मंदिर आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों के लिए गहरी आस्था का केंद्र है। मंदिर में नवरात्र के अवसर पर श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या में आवाजाही होती है और नवमी के दिन आयोजित होने वाला मेला विशेष आकर्षण का केंद्र रहता है। उपलब्ध विवरणों के अनुसार मंदिर में चैत्र तथा आश्विन नवरात्र के अवसर पर भी धार्मिक आयोजन एवं मेले की परंपरा रही है। आश्विन नवरात्र की नवमी पर लगने वाला मेला विशेष रूप से प्रसिद्ध है। दूर-दराज के गांवों से लोग भगवान नौलिंग देव के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए यहां पहुंचते हैं।

नौलिंग देवता की लोक आस्थासनगाड़ नवमी मेले का मूल आधार भगवान नौलिंग देवता के प्रति लोगों की गहरी आस्था है। स्थानीय लोक मान्यताओं में नौलिंग देवता का संबंध भगवान मूलनारायण से जोड़ा जाता है। क्षेत्रीय परंपराओं में मूलनारायण, नौलिंग और बंजैण देवताओं को विशेष श्रद्धा के साथ पूजा जाता है। लोककथाओं के अनुसार सनगाड़ क्षेत्र में नौलिंग देवता ने अत्याचार करने वाले एक दैवीय/असुरी शक्ति का सामना कर क्षेत्रवासियों को संकट से मुक्ति दिलाई थी। इसी कारण स्थानीय लोगों के बीच नौलिंग देवता को क्षेत्र के रक्षक देवता के रूप में विशेष सम्मान प्राप्त है। इन मान्यताओं का स्वरूप लोकपरंपरा पर आधारित है और पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक रूप से आगे बढ़ता आया है।

श्रद्धालु अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए मंदिर में पूजा-अर्चना करते हैं। स्थानीय मान्यता में संतान प्राप्ति सहित विभिन्न मनोकामनाओं के लिए यहां श्रद्धा से पूजा करने की परंपरा का उल्लेख मिलता है। मनौती पूरी होने पर श्रद्धालु मंदिर में घंटी, छत्र तथा पूजा से संबंधित अन्य सामग्री अर्पित करते हैं। कुछ श्रद्धालु अपने पूर्वजों की स्मृति में धर्मशाला आदि का निर्माण भी करवाते हैं। इस प्रकार मंदिर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि लोकसेवा और सामुदायिक सहयोग की परंपरा से भी जुड़ा हुआ है। इस मेले का मुख्य आकर्षण शामा, भनार, लीती सहित दानपुर क्षेत्र व नाकुरी क्षेत्र के अनेक ग्रामीण जो ढोल नगाड़ों के साथ इस मेले में आते है और मंदिर के समीप पहुॅचने पर देव डंगरियों की आगवानी जिस धर्मिक अनुष्ठान के साथ की जाती है। शामा, भनार से जो देव डंगरियें अवतरित होकर आते है उनकी आगवानी के लिए सनगाढ़ के देव डंगरियों द्वारा आपस में मिलकर जो मिलन किया जाता है वह सभी को अपनी ओर बरबस करता है। इस मंदिर के मुख्य पुजारी मौहोली में रहने वाले धामी परिवार के सदस्य होेते है तथा पंडित जी का कार्य प्रमुखतः गौखुरी के पंत व पचार, पठक्यूड़ा सहित अन्य स्थानीय गॉवों के होते है। सनगाढ़ मेले को भव्यता प्रदान करने के लिए निर्वाचित जनप्रतिनिधियांे व प्रशासन द्वारा मंदिर कमेटी के साथ समन्वय स्थापित कर कार्य किए जाते है। अब मंदिर तक गाड़ी की रोड बन चुकी है साथ ही नाकुरी क्षेत्र के लोगों को सड़क मार्ग के जाड़ने के प्रयास किये जा रहे है जो शीघ्र पूर्ण होंगे। पूर्व में इस मेले में मेलार्थी पैदल चलकर आते थे इस मेले में बाहर से आने वाले अनेक श्रद्वालु जो अपनी मनोकामना के लिए मंदिर में पूजा करते है उन्हें देव डंगरियों को आवाज लगाकर उनकी मनोकमना पूर्ण होने का आर्शिवाद दिया जाता है इस मेले को राजकीय मेला घोषित करने के लिए क्षेत्रीय जनता ने कई बार अपनी बात रखी है ताकि जनपद सहित अन्य स्थानों से श्रद्वालु व पर्यटक यहॉ आ सकें। श्रद्वालुओं द्वारा मंदिर कमेटी के साथ समन्यव स्थापित कर धर्मशालाओं के निर्माण में सहयोग दिया जाता है। अब इस क्षेत्र में पर्यटकों को सुविधा प्रदान किये जाने के उद्देश्य से होम-स्टे भी प्रारम्भ कर दिये है जिससे लोगों को सुविधा मिल रही है।

पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान

नवमी मेले के अवसर पर प्रातःकाल मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना और मंत्रोच्चार के साथ धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। श्रद्धालु परिवार सहित मंदिर पहुंचकर भगवान नौलिंग देव के दर्शन करते हैं। अनेक श्रद्धालु ढोल-नगाड़ों के साथ अपनी पूजा लेकर मंदिर पहुंचते हैं। जिन लोगों की मनोकामनाएं पूरी हुई होती हैं, वे विशेष पूजा-अर्चना कर देवता के प्रति आभार व्यक्त करते हैं। मंदिर में परंपरागत धार्मिक व्यवस्था के अंतर्गत पूजा-अर्चना संपन्न कराई जाती है। पूर्व के आयोजनों में मंदिर परिसर में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की उपस्थिति दर्ज की गई है।

नवमी मेले की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में धार्मिक आस्था के साथ-साथ सामूहिक सहभागिता है। गांवों से आने वाले लोग एक-दूसरे से मिलते हैं, परिवार और रिश्तेदार एकत्रित होते हैं तथा नई पीढ़ी को अपनी लोक परंपराओं से परिचित होने का अवसर मिलता है। इस दृष्टि से यह मेला सामाजिक मेल-जोल को मजबूत करने वाला महत्वपूर्ण आयोजन भी है।

कुमाऊँ की लोक संस्कृति का रंग

सनगाड़ नवमी मेले की पहचान केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं है। मेले में झोड़ा, चांचरी और छपेली जैसे पारंपरिक लोकगीत एवं लोकनृत्य विशेष आकर्षण का केंद्र रहते हैं। मंच पर स्थानीय कलाकारों के साथ विभिन्न सांस्कृतिक दल अपनी प्रस्तुतियां देते हैं। रात में पारंपरिक चांचरी और झोड़ा गायन का आयोजन वातावरण को पूरी तरह लोक रंग में रंग देता है।

सनगाड़ मेले से जुड़ा पारंपरिक झोड़ा “सनगाड़ैकि रमुलि दीदी…” भी क्षेत्र की लोक सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा माना जाता है। पुराने समय से ही मेले में इस प्रकार के लोकगीतों का गायन लोगों के आकर्षण का केंद्र रहा है। लोकगीतों में पहाड़ का जीवन, रिश्ते, प्रकृति, प्रेम, सामाजिक संबंध और स्थानीय बोली की मिठास दिखाई देती है। यही कारण है कि मेले में आने वाले बुजुर्ग जहां अपनी पुरानी सांस्कृतिक स्मृतियों को फिर से जीवंत होते देखते हैं, वहीं युवा पीढ़ी भी अपनी जड़ों से जुड़ने का अवसर प्राप्त करती है।

स्थानीय कलाकारों और विद्यार्थियों को मंच

मेले के दौरान स्थानीय विद्यालयों और सांस्कृतिक दलों को भी अपनी प्रतिभा प्रस्तुत करने का अवसर मिलता है। पूर्व के आयोजनों में राजकीय इंटर कॉलेज सनगाड़ के विद्यार्थियों द्वारा रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए गए हैं। विभिन्न लोक कला मंचों के कलाकारों ने उत्तराखण्ड के पारंपरिक गीतों, नृत्यों और नाट्य प्रस्तुतियों के माध्यम से दर्शकों का मनोरंजन किया है।

ऐसे आयोजन ग्रामीण क्षेत्र के प्रतिभाशाली कलाकारों के लिए महत्वपूर्ण मंच का कार्य करते हैं। इससे स्थानीय लोककलाओं को संरक्षण मिलता है और युवा कलाकारों में अपनी सांस्कृतिक विरासत के प्रति रुचि एवं गौरव की भावना विकसित होती है।

मेले में बाजार और स्थानीय अर्थव्यवस्था

सनगाड़ नवमी मेला स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण है। मेले में विभिन्न प्रकार की दुकानें सजती हैं, जहां स्थानीय लोग और बाहर से आने वाले व्यापारी अपनी सामग्री बेचते हैं। पूजा सामग्री, घरेलू उपयोग की वस्तुएं, खिलौने, खान-पान की सामग्री तथा अन्य सामान की दुकानें मेले में दिखाई देती हैं। श्रद्धालु पूजा-अर्चना के साथ खरीदारी का भी आनंद लेते हैं।

मेले के माध्यम से छोटे दुकानदारों, स्थानीय उत्पादकों और ग्रामीण उद्यमियों को ग्राहकों तक पहुंचने का अवसर मिलता है। इस प्रकार धार्मिक एवं सांस्कृतिक आयोजन ग्रामीण क्षेत्र में आर्थिक गतिविधियों को भी गति प्रदान करते हैं।

भंडारा और सामुदायिक सहभागिता

सनगाड़ नवमी मेले की एक अन्य विशेषता सामुदायिक सहयोग है। विभिन्न सामाजिक संगठनों और स्थानीय लोगों द्वारा श्रद्धालुओं के लिए भंडारे एवं अन्य सेवा कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। पूर्व में ‘हमार पहाड़ सेवा समिति’ द्वारा भंडारे का आयोजन किए जाने का उल्लेख मिलता है। इस तरह मेले में सेवा, सहयोग और अतिथि-सत्कार की पहाड़ी परंपरा भी देखने को मिलती है।

मेले का सामाजिक महत्व

आज के बदलते दौर में जब गांवों से लोगों का पलायन हो रहा है और पारंपरिक लोक संस्कृतियां धीरे-धीरे आधुनिक जीवनशैली के प्रभाव में बदल रही हैं, ऐसे मेले सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सनगाड़ नवमी मेला अलग-अलग गांवों और परिवारों को एक स्थान पर जोड़ता है। प्रवासी ग्रामीण भी अवसर मिलने पर अपने पैतृक गांव और देवस्थल पहुंचते हैं। इससे गांव के सामाजिक ताने-बाने को मजबूती मिलती है और नई पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ी रहती है।

प्रशासन और स्थानीय समिति की भूमिका

इतने बड़े धार्मिक एवं सांस्कृतिक आयोजन के सफल संचालन के लिए मंदिर ट्रस्ट, मेला समिति, स्थानीय ग्रामीणों, पुलिस और प्रशासन के बीच समन्वय आवश्यक होता है। पूर्व के आयोजनों में प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा मेला स्थल का निरीक्षण कर सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लेने का उल्लेख मिलता है। यातायात व्यवस्था, श्रद्धालुओं की सुरक्षा, स्वच्छता, पेयजल, पार्किंग तथा चिकित्सा जैसी व्यवस्थाएं मेले की सफलता के लिए महत्वपूर्ण हैं।

मेले में आने वाले श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए स्थानीय समिति द्वारा व्यवस्थाएं की जाती हैं। सड़क और संपर्क मार्गों की स्थिति भी मेले के सफल आयोजन के लिए महत्वपूर्ण रहती है। पूर्व में सनगाड़ सड़क के सुधार और मंदिर तक पहुंचने वाले मार्ग को दुरुस्त करने की मांग भी उठाई गई है।

आस्था और संस्कृति का संगम

सनगाड़ नवमी मेला वास्तव में धर्म, लोकसंस्कृति, सामाजिक समरसता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का संगम है। यहां मंदिर की घंटियों के बीच होने वाली पूजा-अर्चना, ढोल-नगाड़ों की गूंज, झोड़ा-चांचरी के पारंपरिक स्वर, रंग-बिरंगे सांस्कृतिक कार्यक्रम और मेले की चहल-पहल मिलकर एक विशिष्ट वातावरण का निर्माण करते हैं।

यह मेला केवल एक दिन का धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही लोक आस्था और सांस्कृतिक परंपराओं का जीवंत उत्सव है। सनगाड़ की पहाड़ियों में जब नवमी के अवसर पर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है और लोक कलाकार पारंपरिक गीतों की प्रस्तुति देते हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो कुमाऊँ की पुरानी सांस्कृतिक स्मृतियां वर्तमान में फिर से जीवंत हो उठी हों।

इस प्रकार सनगाड़ नवमी मेला बागेश्वर जनपद की धार्मिक एवं सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह मेला स्थानीय देव आस्था को मजबूत करने के साथ-साथ कुमाऊँ की लोक परंपराओं, गीत-संगीत, नृत्य और सामाजिक एकता को भी नई पीढ़ी तक पहुंचाने का कार्य कर रहा है। आवश्यकता है कि ऐसे पारंपरिक मेलों का व्यवस्थित संरक्षण और प्रचार-प्रसार किया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी अपनी समृद्ध लोक विरासत, परंपराओं और देवभूमि की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी रहें।

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