मंजू कपकोटी ने REAP (रीप) परियोजना के सहयोग से अपने सिलाई व्यवसाय को नया विस्तार देकर आत्मनिर्भरता की मिसाल पेश की
Almora=अल्मोड़ा, जनपद अल्मोड़ा के विकासखंड लमगड़ा अंतर्गत ग्राम कपकोट निवासी मंजू कपकोटी (पत्नी कुलदीप सिंह कपकोटी) ने REAP (रीप) परियोजना के सहयोग से अपने सिलाई व्यवसाय को नया विस्तार देकर आत्मनिर्भरता की मिसाल पेश की है। मंजू कपकोटी वर्ष 2018 से कफकोट की प्रतिज्ञा स्वयं सहायता समूह से जुड़ी हैं तथा वर्तमान में स्वागत सहकारिता के अंतर्गत सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। वे पिछले 8 वर्षों से सिलाई का कार्य कर रही हैं।
मंजू कपकोटी के अनुसार क्षेत्र में सिलाई की दुकानों की संख्या बढ़ने और रेडीमेड कपड़ों की उपलब्धता के कारण ग्राहकों की संख्या कम होने लगी थी, जिससे व्यवसाय को आगे बढ़ाना और स्थायी आय सुनिश्चित करना चुनौती बन गया था।
इस स्थिति में REAP परियोजना के माध्यम से उन्हें प्रशिक्षण एवं व्यवसाय विस्तार हेतु सहयोग प्रदान किया गया। उनके व्यवसाय को बढ़ाने के लिए लगभग ₹3 लाख की व्यावसायिक योजना तैयार की गई, जिसमें—₹75,000/- परियोजना सहायता, ₹1,50,000/- बैंक ऋण तथा ₹85,000/- स्वयं का अंशदान शामिल रहा।
जिला परियोजना प्रबंधक REAP (रीप) राजेश मठपाल ने बताया कि इस वित्तीय सहयोग से मंजू कपकोटी ने अपने सिलाई केंद्र के लिए आवश्यक मशीनें एवं उपकरण उपलब्ध कराए, जिनमें दो पायदान सहित हाथ की मशीन, पिको मशीन, इंटरलॉक मशीन तथा काउंटर टेबल आदि शामिल हैं।
सुविधाएं बढ़ने के बाद उन्होंने महिलाओं एवं किशोरियों के लिए सूट, प्लाजो, पैंट, ब्लाउज आदि की सिलाई का कार्य प्रारंभ किया। साथ ही उन्होंने स्थानीय महिलाओं/लड़कियों को सिलाई का प्रशिक्षण देना भी शुरू किया। अब तक वे 15–16 लड़कियों को प्रशिक्षण दे चुकी हैं, जिससे उन्हें आत्मनिर्भर बनने का अवसर मिला है।
आय में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। पहले जहाँ उनकी मासिक आय लगभग ₹1500–₹2000 तक सीमित थी, वहीं अब नियमित रूप से उनकी मासिक आय ₹4000–₹5000 तक पहुँच गई है। वहीं सीजन के समय उनकी मासिक आय ₹15,000–₹16,000 तक भी हो जाती है। प्रशिक्षण कार्य से भी उन्हें प्रति प्रशिक्षार्थी लगभग ₹700/- प्रति माह अतिरिक्त आय प्राप्त हो रही है।
मंजू कपकोटी की यह सफलता कहानी दर्शाती है कि सही मार्गदर्शन, प्रशिक्षण और वित्तीय सहयोग से ग्रामीण महिलाएं न केवल स्वयं का रोजगार स्थापित कर सकती हैं, बल्कि अन्य महिलाओं को भी आत्मनिर्भर बनाकर समाज में सकारात्मक बदलाव ला सकती हैं। उनका सिलाई केंद्र आज क्षेत्र में हुनर, रोजगार और आत्मनिर्भरता का प्रेरणादायक उदाहरण बन चुका है।