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अंकिता भंडारी हत्याकांड : अल्मोड़ा में विशाल जुलूस, सीबीआई जांच की मांग तेज विधायक मनोज तिवारी के नेतृत्व में प्रदर्शन, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रहे मौजूद

अल्मोड़ा – अंकिता भंडारी हत्याकांड को लेकर पूरे प्रदेश में आक्रोश व्याप्त है। इसी क्रम में अल्मोड़ा विधायक मनोज तिवारी के नेतृत्व में आज अल्मोड़ा नगर में एक विशाल जुलूस निकाला गया, जिसमें आम जनता, महिला संगठनों, युवाओं एवं कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। जुलूस के माध्यम से प्रदेश सरकार से इस जघन्य हत्याकांड की सीबीआई जांच की मांग की गई।
इस जुलूस में प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल,पूर्व प्रदेश अध्य्क्ष करन महारा तथा जिला कांग्रेस अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह भोज भी विशेष रूप से उपस्थित रहे।
विधायक मनोज तिवारी ने कहा की “अंकिता भंडारी की हत्या केवल एक परिवार की बेटी की हत्या नहीं, बल्कि पूरे समाज की आत्मा पर हमला है। सरकार इस मामले में सच्चाई को दबाने का प्रयास कर रही है। जब तक सीबीआई जांच नहीं होती, तब तक पीड़ित परिवार को न्याय नहीं मिल सकता। अल्मोड़ा की जनता आज यह संदेश दे रही है कि अब चुप नहीं बैठेंगे।”
पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल ने कहा की “प्रदेश की भाजपा सरकार दोषियों को बचाने का काम कर रही है। जिस तरह से सबूत मिटाए गए और जांच को कमजोर किया गया, उससे सरकार की मंशा साफ नजर आती है। कांग्रेस पार्टी सड़क से सदन तक इस लड़ाई को लड़ेगी और सीबीआई जांच कराकर ही दम लेगी।”
जिला कांग्रेस अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह भोज ने कहा की “आज अल्मोड़ा की सड़कों पर उमड़ा जनसैलाब यह साबित करता है कि जनता अब झूठे आश्वासनों से बहलने वाली नहीं है। अंकिता को न्याय दिलाना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है। जिला कांग्रेस कमेटी इस आंदोलन को और तेज करेगी और जब तक न्याय नहीं मिलेगा, संघर्ष जारी रहेगा।”

कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य करण मेहरा ने उत्तराखंड की बेटी अंकिता भंडारी की नृशंस हत्या को पूरे देश के लिए शर्मनाक बताया है। उन्होंने कहा कि यह केवल एक हत्या नहीं, बल्कि भाजपा शासन में सत्ता संरक्षण प्राप्त अपराधियों द्वारा कानून व्यवस्था को कुचलने का जीवंत उदाहरण है।
मेहरा ने कहा कि अंकिता को न्याय दिलाने के लिए प्रदेश की जनता लगातार सड़कों पर है, लेकिन भाजपा सरकार आज भी अपने रसूखदार नेताओं और उनके करीबी अपराधियों को बचाने में जुटी हुई है। जिस तरह से इस पूरे प्रकरण में साक्ष्यों से छेड़छाड़, वीआईपी को बचाने और मामले को दबाने की कोशिशें सामने आई हैं, वह यह सिद्ध करता है कि राज्य सरकार निष्पक्ष जांच नहीं चाहती।

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