‘ लखनवी पेड़े ‘ अपनी नजाकत, मिठास तथा आकार के कारण इसका नाम लखनवी पेड़े पड़ा
नबाबों के शहर लखनऊ की नजा`कत और मुगलिया सल्तनत का प्रभाव दिल्ली में हाल तक महसूस किया जाता था। इन महानगरों के पुराने वासिन्दों की बोलने की अदा ही कुछ और थी। शायद राजधानी होने का प्रभाव रहा हो। इसी प्रकार अल्मोड़ा को भी चन्द राजाओं की राजधानी बनने का सौभाग्य मिला। इसका प्रभाव अभी भी यहाँ दिखाई देता है। इस नगर को ऐतिहासिक, सांस्कृतिक,पौराणिक तथा बुद्धिजीवियों का नगर भी कहा जाता है। शिक्षा, साहित्य, राजनीति आदि क्षेत्रों में भी यह नगर महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
अपनी विरासत के क्रम में चॅाकलेट, बाल मिठाई, सिंगौड़ी तथा मेथी के लड्डू के बारे में मैंने लिखा था।इसी क्रम में अब ‘ लखनवी पेड़े ‘ के बारे में लिख रहा हूँ। शायद अपनी नजाकत, मिठास तथा आकार के कारण इसका नाम लखनवी पेड़े पड़ा।
इसको बनाने का तरीका बहुत आसान है। शुद्ध, साफ़ तथा ताजा खोये ( मावा ) में आवश्यकता के अनुसार चीनी मिलाकर उसको हल्की आँच में भूना जाता है । भूनते समय यह ध्यान देना होता है कि मावा जलने न पावे।भूनते समय यह भी ध्यान रखना चाहिए कि मावे का रंग न बदले। जब चीनी मिला मावा भुन जाता है तब उसे एक थाली में फैला कर रख दिया जाता है। कुछ ठन्डा हो जाने पर उसमें खाने वाले केवड़े के इत्र की कुछ बूंदें डालकर उसको खूब मसल दिया जाता है और तैयार मसाले में से कुछ मसाला लेकर अंगुलियों के सहारे से छोटी – छोटी गोलियाँ बना ली जाती है। शुद्ध मावे की यह मिठाई खाने में स्वादिष्ट होती है।यह मिठाई ‘ लखनवी पेड़े ‘ के नाम से प्रसिद्ध है। लखनवी पेड़े बनाने का श्रेय भी यहीं के मिष्ठान्न विक्रेताओं को जाता है।
प्रकाश पंत
वरिष्ठ पत्रकार