अल्मोड़ा की कुछ प्रसिद्ध मिठाइयां और उनकी निर्माण विधि
खनऊ की रेवड़ी ,सन्डीला के लड्डू ,आगरा का पेठा ,मथुरा के पेड़े प्रसिद्ध हैं। उसी प्रकार अल्मोड़ा की बाल मिठाई भी प्रसिद्ध है।अल्मोड़ा की इस सौग़ात को बनाने का तरीका कोई अधिक कठिन नहीं है।
शुद्ध दूध से बने मावा ( खोया ) में चीनी मिलाकर उसको कढ़ाई में तब तक भूना जाता है जब तक वह गहरा भूरा रंग का न हो जाय । इस बात का ध्यान रखना भी जरूरी है कि मावा जल न जाय । लकड़ी के मोटे करछुल से घोटते समय मावा भी महीन होता जाता है। बीच – बीच में कढ़ाई में भुन रहे मावे को अंगुली में लेकर दबाने पर उसकी तासीर पता चल जात है। यदि उसमें पर्याप्त लोच न आ पाई हो तो उसमें अन्दाज़ से पानी मिलाकर उसे फिर घोटा जाता है । कारगर लोच लाने के लिए भूनते समय अन्दाज़ से थोड़ा सा टाट्रिक का टुकड़ा भी कोई मिला देते हैं। इससे लचक अच्छी आ जाती है। जब यह पदार्थ बन जाता है उसे थालियों में उतार लिया जाता है । कुछ समय बाद यह पदार्थ जम जाता है।उसे छोटे टुकड़ों में थाली में ही काट लिया जाता है। इसको यहाँ चॅाकलेट का नाम दिया जाता है।
अब एक गहरी कढ़ाई में पोश्त के बीज डालकर उसमें गर्म चीनी की गाढ़ी चासनी जरा सी डालकर कपड़े के अनेक टुकड़ों को आपस में मिलाकर हाथ से पकड़ कर बीज और गर्म चासनी को कढ़ाई में दबाव देकर क्लाक वाइज रगड़ा जाता है। बार – बार गर्म चासनी डालकर यह प्रक्रिया दुहरायी जाती है। गर्म चासनी भी अन्दाज़ से ही डालनी पड़ती है । पोश्त के बीज और चासनी को रगड़ते रहने पर वह होमियोपैथ की गोलियों का सा आकार ले लेती हैं। इनको कुछ और बड़ा कर लिया जाता है। इनको छानकर एक थाली में रख लिया जाता है।अब भुने हुए मावे ( ऊपर जो चॅाकलेट बने हैं ) को 3 गुणा 1 गुणा 1 इंच के आकार में काटकर जलेबी समान चासनी में डुबो कर गोलियों वाली थाली में डालकर हिलाया जाता है। चीनी और पोश्ते वाली गोलियाँ उस चॅाकलेट में चिपक जाती हैं। इसप्रकार यह मिठाई बनती है । इसको बाल मिठाई कहते हैं । खाने में स्वादिष्ट होती है और कुछ टिकाऊ भी। यह मिठाई यहाँ से दूर – दूर तक जाती है । अंग्रेजी राज्य में तो इग्लैंण्ड तक यह मिठाई भेजी जाती थी। यह अल्मोड़ा की सौगात है।
प्रकाश पंत,
वरिष्ठ पत्रकार