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प्रभात जोशी जैसे कलाकारों को आखिर कब मिलेगा प्रोत्साहन ?


रजत जयंती के मौके पर ध्यान दे सरकार  
अल्मोड़ा। प्रदेश में अपनी अलग सांस्कृतिक पहचान रखने वाले ऐतिहासिक नगर अल्मोड़ा का कई क्षेत्रों के नामचीन हस्तियों का नाता रहा है। इस भूमि की उर्वराशक्ति को पहचान पर नृत्य सम्राट उदयशंकर जैसे महान विभूति ने इस नगर को अपनी कर्मस्थली बनाया है। वहीं आधात्म के क्षेत्र में महान संत स्वामी विवेकानंद आदि भी इस पावन भूमि में आकर अलग ही अनुभूति प्राप्त कर चुके हैं। कला के क्षेत्र में भी इस नगरी की निकट से नाता रहा है। ऐसी ही एक  सख्यियत हैं प्रभात कुमार जोशी। तल्ला गल्ली निवासी प्रभात मिनीएचर पेटिंग( लघुचित्र कला) के  विशेषज्ञ हैं। उन्होंने इस कला में परंपरा से इतर लैंडस्केप यानि प्रकृति को प्राथमिकता देकर नया प्रयोग किया है। साठ दशक से अधिक की आयु पार कर चुके प्रभात ने शादी नहीं की और इस कला को ही अपना हम सफर बना लिया। उम्र के इस पड़ाव में भी अपने शगल को बदस्तूर जारी रखे हुए हैं। उनके बनाए लघु चित्र हिमालय की विराट आभा को अति सूक्ष्म में प्रदर्शित करते हैं जोकि देखने वाले को आश्यर्च में डाल देते हैं। प्रकृति के हर विषय को उन्होंने अपने लघु चित्रों में स्थान दिया है। देश व विदेश के कला विशेषज्ञ उनकी कला की सराहना कर चुके हैं। इनमें जाने माने चित्रकार  लोक संस्कृति संग्रहालय भीमताल के संस्थापक पद्मश्री डा यशोधर मठपाल शामिल रहे हैं।  ललित कला अकादमी दिल्ली के पूर्व कार्यकारी निदेशक आनंद देव व कई देश व विदेश के कलाप्रेमी उनके चित्रों की खासी सराहना कर चुके हैं। कांग्रेस के दौर में अल्मोड़ा विस क्षेत्र से तत्कालीन विपक्ष जनसंघ के एकमात्र विधायक रहे स्व राम चंद्र जोशी वकील के बेटे प्रभात को बचपन से कला के प्रति अनुराग था। पढ़ाई के बाद उन्होंने रोजगार के बजाय कला को ही अपनी भविष्य बना लिया जोकि आज भी यथावत जारी है।  मिनिएचर पेटिंग का उत्तरभारत से सदियों पुराना नाता रहा है। जानकारी के अनुसार क्षेत्र में इसकी शुरुआत 17वीं शताब्दी से हो गई थी। शुरुआत में इसके विषय धार्मिक साहित्यिक के साथ ही प्रेम-आधारित विषय रहे। वहीं  राधा-कृष्ण और बारहमासा जैसे विषय को भी प्राथमिकता दी गई। लेकिन प्रभात जोशी ने इसमें लेडस्पेक यानि प्रकृति को अपना विषय बनाया है। उनके 1.3 सेमी तक के लघुचित्रों को देखने के लिए  सीधे आंख के बजाय मैग्नीफाइंग लेंस की जरूरत होती है। इसके बाद दर्शक इनमें दिखाई देने वाली हिमालय नदी पहाड़ आदि खूबसूरत नजारों का विहंगम संसार देख पाता है। प्रभात इन चित्रों को बनाने में वाटर आयल एकलिक तथा पोस्टल कलर का उपयोग करते हैं। उन्होंने 5 हजार लघु चित्र दो दर्जन से अधिक तैल चित्र तथा सौ से अधिक वाटर कलर पेंटिग बनाई है। यह सिलसिला अभी जारी है। राष्ट्रीय कला मेला बाल भवन दिल्ली  संस्कार भारती नागपुर आल इंडिया फाइन आर्ट एंड क्राफ्ट सोसायटी दिल्ली तथा स्वर्ण जयंती कला प्रदर्शनी ललित कला अकादमी लखनऊ आदि स्थानों में उनके लघुचित्रों की प्रदर्शनी लगाई जा चुकी है।
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विशेषज्ञ कर चुके हैं सराहना- ललित कला अकादमी दिल्ली के पूर्व कार्यकारी निदेशक आनंद देव ने प्रभात जोशी की पेंटिंग पर अपनी प्रतिक्रिया में कहा है कि सूक्ष्म व सशक्त रचना प्रक्रिया का भाग है जो रचनाकार को छोटे धरातल में बड़ी बात कहने का अधिकार देती है। प्रभात जोशी यदि किरण से सूर्य का बोध करवाते हैं तो यह अपने आप में एक बड़ी बात है। लोक संस्कृति संग्रहालय भीमताल के संस्थापक पद्मश्री डा यशोधर मठपाल ने प्रभात की पेटिंग पर अपनी प्रतिक्रिया में कहा है कि मुगलकाल से लेकर 19 वीं सदी तक लघुचित्रण की एक समृद्ध परंपरा रही है। उस परंपरा को ओर अधिक निखार देते हुए युगानुरूप उसमें परिवर्तन और परिमार्जन लाते हुए प्रभात ने लघु चित्रों को सूक्ष्मतम कलेवर देने के प्रयास में अद्भुद सफलता पाई है। उत्तराखंड के साथ ही देश के कलाकारों में उन्होंने अपना अलग सम्मानित स्थान बना लिया है।

रजत जयंती वर्ष में ध्यान दे सरकारः प्रभात जोशी जैसे कलाकारों को उत्तराखंड राज्य गठन के बाद से कोई विशेष प्रोत्साहन नहीं मिल पाया है। जोशी जैसे कलाकारों की  कलाकृतियों को संरक्षित करने के साथ ही प्रदर्शित करने के लिए सरकार कोई नीति नहीं बना सका है। संस्कृति विभाग के साथ ही जिला स्तर पर प्रशासन को भी रजत जयंती के मौके पर ऐसे छिपी हुई प्रतिभाओं को आगे लाने के लिए कारगर कदम उठाने होंगे। संस्कृति व कला प्रेमियों की ओर से यह मांग की जा रही है।  

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