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उत्तराखंड में मानव-वन्य जीव संघर्ष के आंकड़े

डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला


जैव विविधता से समृद्ध उत्तराखंड राज्य में पिछले एक दशक में मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं में नाटकीय रूप से वृद्धि हुई है, विशेष रूप से तेंदुओं द्वारा आवासीय क्षेत्रों पर अतिक्रमण करने और घातक हमले करने की घटनाएं बढ़ी हैं।जंगलों में बढ़ते बाघ तेंदुओं को जंगल से बाहर खदेड़ रहे हैं। वहीं आबादी में तेंदुए की आमद से मानव-वन्य जीव संघर्ष बढ़ रहा है। ऐसे में जंगल और आबादी क्षेत्र के बीच तेंदुए इंसानों और बाघों की नजरों से बचकर अपना अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। तेंदुओं की इस दशा को लेकर वन विभाग और वन्य जीव विशेषज्ञ भी चिंतित हैं। जिम कॉर्बेट टाइगर रिजर्व में बाघों का कुनबा बढ़ने के साथ ही उससे सटे तराई पश्चिमी वन प्रभाग में भी 57 बाघों की मौजूदगी है।
तराई के जंगलों में तेजी से बढ़ती बाघों की संख्या तेंदुओं के लिए खतरा है। बाघ अब तेंदुओं के घर यानी जंगल के सीमावर्ती क्षेत्रों तक पहुंच गए हैं। ऐसे में बाघ जंगल से खदेड़कर तेंदुओं को आबादी की ओर भेज रहे हैं। इस कारण तेंदुए आबादी वाले क्षेत्रों में कुत्ते व बिल्ली का शिकार कर रहने को मजबूर हैं।मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं इंसानों के लिए जनहानि और शारीरिक जख्म के रूप में तो देखी जाती है, लेकिन मानसिक स्वास्थ्य पर इसको लेकर कभी कोई बात नहीं होती. चिंता की बात ये है कि ऐसे अवसाद से गुजरने वाले लोग भी कई बार खुद इसको लेकर जागरूक नहीं होते. नतीजा ये होता है कि ऐसे लोगों के शारीरिक जख्म तो भर जाते हैं, लेकिन मानसिक आघात से इन्हें जीवन भर गुजरना पड़ता हैउत्तराखंड के सैकड़ों परिवार खूंखार वन्यजीवों के हमलों से पीड़ित रहे हैं. कईयों ने अपनों को खोया है तो कई लोग सालों तक उस खौफ को अपने जहन से निकाल ही नहीं पाए. ये हालात न केवल हमले के बाद जीवित रहने वालों की जिंदगी को डिस्टर्ब कर देते हैं, बल्कि उनके रोजगार और जीवन शैली की व्यवस्था को भी प्रभावित करते हैं. राज्य में ऐसी कोई एक या दो मामले नहीं है, बल्कि प्रदेश में ऐसे मामलों की भरमार है.  मानव वन्यजीव संघर्ष के बाद जो लोग इलाज के बाद स्वस्थ हो जाते हैं, उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर रखना होता है. क्योंकि, ऐसी घटनाओं के बाद कई लोगों में मानसिक रूप से अवसाद आ जाता है और इसके कारण उन्हें पूरी जिंदगी मानसिक रूप से कई तरह की समस्याओं से जूझना होता है. हालांकि, प्रमुख वन संरक्षक कहते हैं कि इसके लिए पहली बार वन विभाग डॉक्टरों से भी बात करते हुए इसके हल पर काम करने का प्रयास कर रहा है. 71.05 प्रतिशत वन भूभाग वाले उत्तराखंड में आए दिन वन्यजीवों के हमले सुर्खियां बन रहे हैं। यद्यपि, इसकी रोकथाम के लिए वन विभाग प्रयास कर रहा है, लेकिन अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पा रहे हैं। इस सबको देखते हुए समस्या के समाधान के लिए अब तात्कालिक के साथ ही दीर्घकालिक उपायों पर भी आगे बढ़ा जा रहा है।साल 2000 से लेकर सितंबर 2025 तक के आंकड़ों को देखें तो उत्तराखंड में मानव वन्य जीव संघर्ष में लेपर्ड, हाथी, बाघ, भालू, सांप, जंगली सूअर, बंदर /लंगूर ,मगरमच्छ, ततैया, मॉनिटर छिपकली, जैसे वन्यजीवों से मानव संघर्ष में 1256 इंसानों की मौत हुई है. मानव वन्य जीव संघर्ष का सबसे बड़ा कारण जंगलों का सिमटता दयारा है यानी वन्यजीवों का जो घर है इसका दायरा काम होता जा रहा है. इंसान अपनी मानव बस्ती बढ़ाते जा रहे हैं. विकास के नाम पर तो कभी खेती के नाम पर या फिर कभी मानव बस्तियां बसाने के नाम पर जंगलों पर अंधाधुंध कटान हो रहा है. यही वजह है कि मानव वन्य जीव संघर्ष ज्यादा हो गया है. मानव वन्य जीव सह अस्तित्व के प्रमुख मुद्दे आर्थिक नुकसान, सुरक्षा जोखिम, भोजन और जल की कमी, संरक्षण और विकास में टकराव है जिसमें आर्थिक नुकसान में फसल और मवेशियों की क्षति होती है. साथ ही बुनियादी ढांचे को भी नुकसान होता है. वहीं वन्यजीवों के साथ संसाधनों के लिए हमेशा मानव और वन्यजीवों के बीच संघर्ष होता है. विशेष रूप से जल स्रोतों के लिए, जो मानव समाज और वन्यजीवों दोनों को प्रभावित करती है. अब ऐसे में मानव वन्य जीव सह अस्तित्व के समाधान में इसके लिए एक नीतिगत पहल होनी चाहिए जिसमें ग्राम पंचायत को सशक्त बनाना होगा, होने वाले नुकसान के लिए पुख्ता योजनाएं बनानी होंगी और ग्राम स्तर पर ही अंतर विभाग्य समितियां का गठन करना होगा. इसके अलावा प्रौद्योगिकी का भी इस्तेमाल किया जा सकता है जिसमें पूर्व चेतावनी प्रणाली यानी अर्ली मॉर्निंग सिस्टम को लगाया जा सकता है. खासकर यह इंसानी खेती और रेलवे ट्रैक पर कारगर सिद्ध होता है. इसके अलावा निगरानी के लिए ड्रोन और सामुदायिक जन जागरूकता के लिए हॉटलाइन नंबर्स का उपयोग भी किया जा सकता है. इसके अलावा समुदाय आधारित दृष्टिकोण भी रखना होगा यानी स्थानीय समुदायों को संरक्षण में शामिल करना और उनके पारंपरिक ज्ञान को महत्व देना. बुनियादी ढांचे का निर्माण भी पुख्ता किया जाना चाहिए. जानवरों को मानव बस्तियों से दूर रखने के लिए अवरोधों या फिर बाड़ो या सोलर फेंसिंग का निर्माण करना होगा. शहरों के विस्तार के कारण या फिर शहरों की प्लानिंग में पर्यावरण और वन्यजीवों पर पड़ने वाले प्रभावों को ध्यान में रखकर ही इसकी प्लानिंग करनी होगी और सबसे महत्वपूर्ण जन जागरूकता और शिक्षा मानव वन्य जीव अस्तित्व का सबसे महत्वपूर्ण समाधान है. जिसमें लोगों को वन्यजीवों के महत्व और संघर्ष के समाधान के बारे में शिक्षित करना होगा चाहे वह स्कूल हो या फिर गांव. देश के उन चुनिंदा राज्यों में शामिल है, जहां इंसानों और जंगली जानवरों के बीच टकराव सबसे ज़्यादा होता है. राज्य में गुलदार और भालू के हमलों से लोग दशकों से परेशान हैं. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, पिछले 25 वर्षों में 1250 से ज़्यादा लोगों की जान ऐसे हमलों में जा चुकी है, जबकि, 6000 से अधिक लोग घायल हुए हैंउत्तराखंड के कई पहाड़ी इलाकों में गुलदार, भालू और बंदरों के बढ़ते आतंक के कारण लोग अपने घरों को छोड़ने पर मजबूर हो गए हैं. कई गांव लगभग खाली हो चुके हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि केवल मुआवज़ा बढ़ाना काफी नहीं होगा. जरूरत इस बात की भी है कि जंगलों से सटे गांवों में सुरक्षा उपाय, जागरूकता अभियान और मानव-वन्यजीव संघर्ष प्रबंधन योजना को जमीन पर उतारा जाए. मानव-वन्यजीव संघर्ष के लिए समर्पित एक नई शाखा भी स्थापित की गई है, और सूचना के त्वरित प्रसार के लिए टोल-फ्री नंबर को और अधिक सक्रिय और डिजिटल प्रणालियों से एकीकृत किया गया है।हालाँकि, ये कदम मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं को रोकने में नाकाफी साबित हो रहे हैं, जो हर साल बढ़ती जा रही हैं। विशेषज्ञ इस वृद्धि के लिए विभिन्न पारिस्थितिक और मानवीय कारकों को जिम्मेदार ठहराते हैं, जबकि वन विभाग इस समस्या से निपटने के लिए जन जागरूकता को एक प्रमुख रणनीति के रूप में महत्व देता है। स्वतंत्र विशेषज्ञों का यह भी दावा है कि जंगलों के भीतर बड़े पैमाने पर अघोषित वनों की कटाई और हिरण, काकड़ आदि जैसे शिकार का अवैध शिकार जंगली जानवरों को भोजन और पानी की तलाश में जंगलों से बाहर निकलने के लिए मजबूर कर रहा है।विशेषज्ञ इस बात पर भी ज़ोर देते हैं कि एक दीर्घकालिक रणनीति ज़रूरी है। राज्य में वन्यजीव आवासों में बढ़ती मानवीय गतिविधियों को देखते हुए सह-अस्तित्व के लिए एक संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जिसमें आवास पुनर्स्थापन, सख्त शहरी नियोजन और निरंतर जनभागीदारी पर ज़ोर दिया जाए।मानव-वन्यजीव से संबंधित वर्तमान स्थिति इस बढ़ते संकट से निपटने के लिए सामूहिक प्रयासों की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करती है।

लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं

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